बॉम्बे हाईकोर्ट में मराठा आरक्षण मामले में शुक्रवार (9 अक्टूबर) से नई सुनवाई शुरू हो गई है। न्यायमूर्ति एम. एस. कर्णिक, एन. जे. जामादार और संदीप मारणे की तीन जजों की पीठ शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को 10 प्रतिशत आरक्षण देने वाले महाराष्ट्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
यह तीसरी बार है जब 2024 से कोई पीठ इस मामले में बहस शुरू कर रही है - पहले मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय की पीठ उनके दिल्ली हाईकोर्ट तबादले के बाद रुक गई थी, और फिर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे की पीठ उनके कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद अधूरी रह गई।
आरक्षण का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल (2021) फैसले के बाद - जिसमें मराठा समुदाय को "अग्रणी वर्ग" बताया गया था - राज्य विधानमंडल उस निष्कर्ष को पलट नहीं सकता। उन्होंने तमिलनाडु का उदाहरण भी दिया, जहां आरक्षण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में रखा गया है।
50 प्रतिशत सीमा से आगे का 10 प्रतिशत कोटा
महाराष्ट्र सरकार ने फरवरी 2024 में SEBC कानून के तहत "असाधारण परिस्थितियों" का हवाला देकर मराठा समुदाय को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया था, जिससे राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से आगे निकल गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत सीमा तोड़ने के लिए "असाधारण परिस्थितियां" स्थापित नहीं पाईं थीं। अगली सुनवाई पर नजर रहेगी।
मुख्य बातें
- 9 अक्टूबर से बॉम्बे हाईकोर्ट में नई सुनवाई
- 3 जजों की पीठ: कर्णिक, जामादार, मारणे
- 2024 के SEBC कानून को चुनौती
- 10 प्रतिशत कोटा 50 प्रतिशत सीमा से आगे
- 2021 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला
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